संशय क्या है? जानिए यह आपकी जिंदगी को कैसे बर्बाद करता है?
संशय व्यक्ति को निर्णय लेने में असमर्थ बनाता है और कर्म करने से रोकता है। शास्त्रों में इसे "संशयात्मा विनश्यति " (संशय करने वाले का विनाश होता है) कहकर इससे बचने की सलाह दी गई है।
संशय (DOUBT) शब्द का बैसे तो शाब्दिक अर्थ है - शक, संदेह , दुविधा, अनिश्चय , अविश्वास, असमंजस, आशंका आदि।देखने में तो यह मात्र शब्द ही हैं लेकिन यदि संशय हमारी जिंदगी में हो तो हमारी जिंदगी में कुछ भी नहीं बचता। संशय सब कुछ बर्बाद कर देता है।
संशय क्या है ? जानिए यह आपकी जिंदगी को कैसे बर्बाद करता है ?
आपने कई ऐसी कहानियां पढ़ी या सुनी होगी जिससे पता चलता है कि यदि हम कोई काम पूर्ण विश्वास के साथ करते हैं तो उस काम में हमें सफलता मिलते देर नहीं लगती, लेकिन यदि उस काम को लेकर हमारे मन में जरा सी भी विश्वास की कमी हो यानि संशय(DOUBT) हो, तो उस काम में पूर्ण कामयाबी हमें कभी भी नहीं मिल सकती है।
संशय को रामायण के एक प्रसंग से समझते हैं।
(यह बात उस समय की है जिस समय विष्णु भगवान श्री राम के अवतार में सीता माता की खोज में बिलखते हुए बड़े ही दीन हीन भाव से वन में विचरण कर रहे थे।)
एक बार शंकर जी माता सती के साथ बैठे थे तो जब माता सती ने राम को वन में इस तरह एक स्त्री यानि सीता जी के लिए रोते,बिलखते देखा तो माता सती को राम के विष्णु भगवान के अवतार होने पर संशय हो गया।
माता सती ने शंकर जी से पूछा कि प्रभु क्या श्री राम बस्ताव में विष्णु के अवतार हैं ?
तब शंकर जी ने देवी सती से कहा कि " देवी भगवान श्री राम हमारे आराध्य हैं वे विष्णु के ही अवतार हैं, आप अनावश्यक संशय (DOUBT) न करें, यह आपके लिए ठीक नहीं होगा।
शंकर जी के इतना समझाने पर भी देवी सती का संशय नहीं गया। उन्होंने शंकर जी से कहा कि प्रभु मैं राम की परीक्षा लेना चाहती हूं।
भोले नाथ समझ गए कि अब इनको कोई नहीं समझा सकता, इसलिए वे मौन हो गए और समाधी लगा ली।
इधर माता सती, राम के सामने सीता जी का वेश रख कर प्रगट हो गई।
राम ने उन्हें तुरन्त पहचान लिया और उनको प्रणाम किया और पूछा कि शंकर जी कहां हैं ? आप अकेली इस जंगल में किसे ढूंढ रही हैं ?
इस पर माता सती को अपनी भूल का अहसास हो गया, वे बड़े उदास मन से शंकर जी के पास लौट आई।
शंकर जी भी समाधि से जाग चुके थे। शंकर जी ने माता सती से पूछा, ले आयी परीक्षा।
तब देवी सती ने मना कर दिया की मैं परीक्षा लेने गई ही नहीं।
तब भोल नाथ ने जब ध्यान लगाया तो वह सब देख लिया जो माता सती ने ने राम की परीक्षा लेने के लिए किया था।
भोले नाथ बोले कुछ नहीं, उन्होंने सोचा कि अब मुझे इनको त्यागना पड़ेगा क्योंकि इन्होंने सीता जी का रूप रख लिया और सीता जी उनके आराध्य श्री राम जी की पत्नी हैं।
फिर कुछ दिन बाद सती के पिता दक्षराज ने एक यज्ञ करवाया जिसमें अपने दामाद शंकर जी को नहीं बुलाया था। तब सती जी ने भी अपने मायके जाने की जिद की , शंकर जी के समझाने पर भी वे नहीं मानी और अपने मायके चली गई। बहा दक्षराज ने अपनी बेटी को बिना बुलाए आने पर बहुत ताने मारे और शंकर जी बुरा भला कहा, तब सती ने उसी हवन कुंड में अपने उस शरीर का त्याग कर दिया था। बाद में उन्होंने हेमबंत के यहां पार्वती के रूप में जन्म लिया और कठिन तपस्या करके फिर से शंकर जी से शादी की।
ऐसी कई कहानियां संशय को लेकर हमारी रामायण में हैं आप चाहे तो पढ़ सकते हो।
अब आते हैं फिर से संशय पर।
खुद पर संशय क्यों होता है और इससे बाहर कैसे निकलें ?
संशय, शक, या अविश्वास मतलब ज्ञान की कमी या पूर्ण ज्ञान नहीं।
हम जो भी काम करते हैं यदि उसके बारे में हमें सही से ज्ञान हो तो कभी संशय का विचार हमारे मन में आयेगा ही नहीं।
जहां सूर्य का प्रकाश नहीं होगा वहां अंधेरा ऑटोमेटिकली होगा।
इसलिए किसी भी सब्जेक्ट में पहले पूरा ज्ञान होना आवश्यक है। अधूरा ज्ञान दो धारी तलवार की तरह होता है जो अपने को ही काटता है।
खुद पर विश्वास कैसे करें ?
हर बात पर डर और संशय क्यों होता है ?
जिस भी फील्ड में हम कर्म करें सबसे पहले एक अच्छे विद्यार्थी की तरह हमें पूरी जानकारी बटोर लेनी चाहिए फिर हमें उस फील्ड में उतरना चाहिए। तब आपको कोई संशय नहीं होगा।
इसलिए महाभारत के युद्ध में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध से पहले ज्ञान दिया था, जब अर्जुन के पूर्ण संशय मिट गए तब युद्ध लड़ने को कहा और विजय भी हुए।
यदि भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को वह ज्ञान नहीं देते तो अर्जुन का मन संशय में ही रहता कि पता नहीं मैं अपने भाईयों की हत्या करके सही कर रहा हूं या गलत , वे इस इसी उधेड़बुन में उलझे रहते और युद्ध कभी नहीं जीतते क्योंकि किसी भी कार्य की सफलता के लिए मन का एकाग्र होना बहुत आवश्यक है।
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