karma ka Siddhant kya Hai

Karma ka siddhant kya hai , How karma works in life

"कर्म सिर्फ एक शब्द नही है। यह हमारी जिंदगी का अदृश्य लेखाकार (Accountant) है। जो हर पल हमारा हिसाब रख रहा है।"

यह कभी हमारा साथ नही छोड़ता। खाते पीते, सोते जगते, उठते बैठते हर परिस्थिति में हमारे साथ रहता है। बिना शोर किए, बिना रुके यह हमारे हर विचार, हर शब्द और हर कर्म का पूरी ईमानदारी के साथ लेखा जोखा तैयार करता रहता है। 
और एक दिन यही हिसाब हमारी जिंदगी की सच्चाई बन कर हमारे सामने आता है।

कर्म का फल कैसे मिलता है
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Karma kya hai ? ( कर्म क्या है ) Life me karma kaise kaam karta hai ?

कर्म का सरल अर्थ है - हमारे हर विचार, हर शब्द और हर कार्य का परिणाम।

कर्म को अच्छे से समझने के लिए हम आपको यहां एक कहानी सुनाएंगे। कहानी बड़ी ही रोचक और ज्ञानवर्धक है। 




कहानी -1

एक बार एक गरीब व्यक्ति था। उसके एक बेटी थी। बेटी की शादी के लिए उसके पास धन नहीं था। किसी विद्वान से उसने सुना था कि धन प्राप्ति के लिए उसे धन की देवी माता लक्ष्मी की उपासना करनी चाहिए।

माता लक्ष्मी की उपासना के लिए वह एक घने जंगल गया और समाधी लगा दी।

कई वर्ष बीत गए उसे देवी की तपस्या करते हुए। एक दिन मां लक्ष्मी उससे प्रसन्न हुईं और उसके सामने प्रगट हुई।

माता लक्ष्मी बोली: वत्स हम तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हुई हैं, मांगो क्या मांगना चाहते हो ?

व्यक्ति बोला: मां, मेरी बेटी की शादी के लिए मुझे धन की आवश्यकता है। इसीलिए आप मुझे खूब सारा धन दो जिससे मैं अपनी बेटी की शादी धूम धाम से कर सकूं।

माता लक्ष्मी बोली: वत्स, तुम्हारी बेटी की शादी तो हो चुकी है। तुम्हारे परिवार वालों ने तुम्हें बहुत खोजा, लेकिन जब तुम्हारा कोई पता न चला तो उन्होंने मिलकर तुम्हारी बेटी की शादी कर दी। अब वह अपने परिवार में सुख से हैं।

व्यक्ति को माता लक्ष्मी की ये सब बातें सुन कर बड़ा आश्चर्य हुआ।
उसने सोचा चलो जिस काम के लिए हम तपस्या कर रहे थे, वह तो अपने आप हो गया। अब धन लेकर का क्या करेंगे।

व्यक्ति फिर माता लक्ष्मी से बोला: मां, जिस काम के लिए मैं आपको प्रसन्न करना चाहता था , वह तो हो गया अब धन की मुझे आवश्यकता नहीं है।

माता लक्ष्मी बोली: वत्स, तुमने जो तपस्या की है उसका फल तो तुम्हें भोगना ही पड़ेगा क्योंकि नियम के अनुसार हर अच्छे या बुरे कर्म का फल तो व्यक्ति को भोगना ही पड़ता है।

व्यक्ति बोला: मां, मुझे अब धन की कोई आवश्यकता नही है, मैं अपना बचा हुआ जीवन भगवत भक्ति में लगाना चाहता हूं।

माता लक्ष्मी बोली: वत्स, हम तुम्हारे विचारों से बहुत सन्तुष्ट हैं लेकिन विधि के विधान (ईश्वर के नियम) को हम नही बदल सकते। 
आपने जो तपस्या की है उसके फल स्वरूप आपको एक वर्ष के लिए राजा बनना निश्चित है।

इतना कह कर मां लक्ष्मी अंतर्ध्यान हो गई।

व्यक्ति ने सोचा - यह मैं कहां फंस गया। मुझे अपनी बेटी की शादी करने के बाद भगवान की भक्ति में लगाना था। अब एक साल के लिए राजा बनना पड़ेगा।
उसने सोचा, चलो आत्महत्या कर लेते हैं, लेकिन उसे तुरन्त ध्यान आया कि आत्महत्या करना पाप है।
फिर उसने सोचा, ऐसा करते हैं कि जो अपना राजा है उसी पर हमला कर देते हैं जिससे राजा के सैनिक उसे पकड़ लेंगे तब राजा उसे मृत्यु दंड दे  देगा और उससे कोई पाप भी नहीं होगा।

व्यक्ति ने वैसा ही किया, वह राजा के दरवार में धनुष बाण ले कर गया। उसने जाते ही राजा पर निशाना साधा और तीर चला दिया। राजा ने अपना सिर नीचे कर दिया जिसे वह तीर राजा के सिंहासन में छुपे हुए सांप को जा लगा और सांप उस तीर से मर गया। राजा के सैनिकों ने व्यक्ति को पकड़ लिया। 

जब राजा ने उस सांप को देखा तो उसके होश उड़ गए, राजा ने सोचा यदि यह व्यक्ति हमारी आज रक्षा न करता तो यह सांप हमें काट लेता और हमारी मृत्यु आज निश्चित थी।

राजा ने तुरन्त अपने सैनिकों से उस व्यक्ति को छोड़ देने को कहा।
फिर राजा ने उस व्यक्ति को गले से लगाया और कहा तुम कौन हो जिसने आज हमारी जान बचाई। तुम न होते तो आज हम जीवित न होते।
राजा ने दरवार में तुरन्त घोषणा की आज से यह हमारे मित्र हैं। जैसे सभी मेरी आज्ञा का पालन करते हैं वैसे ही सभी इनकी आज्ञा का पालन करेंगे। इन्होंने हमारी जान बचा कर हम पर बहुत बड़ा उपकार किया है और राजा ने उस व्यक्ति को अपने सिंहासन पर बैठाया।

अब राजा हर काम उस व्यक्ति से पूछ-पूछ कर करने लगा। यहां तक कि जब राजा शिकार पर जाता, तो उस व्यक्ति को भी अपने साथ रथ पर बिठा कर ले जाता था।

एक दिन जब राजा शिकार करने जंगल में गया तो काफी दूर निकल गया। शाम हो चली थी। राजा के सैनिकों ने राजा से कहा " महाराज हमें लगता हैं हम रास्ता भटक गए हैं और अंधेरा अधिक होने से रास्ता साफ नहीं दिख रहा है क्यों न हम आज यही रुक जाए।

राजा ने सभी से कहा, आज हम सभी यही रुकेंगे, कल सुबह होते ही अपने राज्य की तरफ प्रस्थान करेंगे।

सैनिकों ने राजा का और उस व्यक्ति का एक ही कैंप लगा दिया। दोनों उसी मैं आराम करने लगे। राजा पूरे दिन का थका हुआ होने के कारण जल्दी ही सो गया । लेकिन उस व्यक्ति को नीद नही आ रही थी, वह सोच कुछ रहा था कि इतने में वह व्यक्ति देखता है कि एक सांप राजा की तरफ बढ़ रहा है जो शायद राजा को काट सकता है। उस व्यक्ति ने तुरन्त ही अपनी तलवार म्यान से निकाली और उस सांप को मारने ही वाला था कि राजा की आंख खुल गई।

राजा ने जब अपने मित्र को इस तरह नंगी तलवार लिए खड़ा देखा तो उसे लगा कि वह उस पर हमला करने वाला था। शायद उसका मित्र अब पहले जैसा नहीं रहा । वह उसे मार कर खुद राजा बनना चाहता है।

उसने तुरन्त अपने सैनिकों को कैंप के अंदर बुलाया और उस व्यक्ति को पकड़वा दिया। और उस व्यक्ति से कहा कि अबसे तुम हमारे मित्र नहीं हो। तुमने जो हमें मारने का प्रयास किया वह एक सच्चा मित्र नही कर सकता। तुम लोभी हो गए हो , राजा बनने के लिए तुम हमें ही मार देना चाहते हो। मेरी समय पर आँखें न खुलती तो शायद तुम्हारा यह सपना पूरा हो जाता। हम तुम्हें अपनी इन आंखों से देखना नहीं चाहते । तुम हमारे पुराने मित्र हो इसलिए छोड़ रहा हुं, और कोई होता तो अवश्य ही मृत्यु दंड देता । तुम्हारी सजा इतनी है कि तुम हमारे राज्य की सीमा से बाहर चले जाओ।

व्यक्ति ने राजा को सांप के बारे में समझान चाहा, लेकिन सांप वहां था ही नहीं। रात के अंधेरे में पता नही कहां चला गया। इसलिए राजा को उसकी बातों पर यकीन ही नहीं हुआ।



यह कहानी भले ही काल्पनिक हो लेकिन कर्म के सिद्धांत को बहुत अच्छी तरह समझा रही है। कर्म करने के बाद, उसका फल आपको भोगना ही होगा। आपके चाहने या न चाहने से कोई फर्क नही पड़ता।

कई बार एक ही कर्म के परिणाम भिन्न भिन्न हो सकते हैं। नियत के हिसाब से इसके फल में अंतर आ जाता है।

जैसे एक ही कक्षा में 50 विद्यार्थियों के एक साथ, एक ही कर्म (पढ़ाई) करते हैं लेकिन नियत में भेद होने के कारण सबका परिणाम अलग हो जाता है ।

कई बार दो व्यक्तियों के एक ही कर्म करते हैं पर नियत अलग होने से एक पाप में बदल जाता है, दूसरा पुण्य में।

जैसे एक व्यक्ति अपने घर में सो रहा है, कोई दूसरा व्यक्ति उस घर में चोरी करने घुसता है, घर का मालिक जाग जाता है। अब चोर चुपके से घर के मालिक को मार देता है। तो यह हत्या चोर का पाप कर्म कहलाएगी। 
अब मान लो पड़ोसी ने उस चोर को हत्या करते हुए देख लिया, चोर भागने की फिराक में था लेकिन पड़ोसी ने चोर को जान से मार दिया, तो यह पुण्य होगा। क्योंकि उसने अपना पड़ोसी धर्म निभाया।

यहां एक ही कर्म दो बार हुआ है, हत्या करना 
चोर द्वारा मालिक की
पड़ोसी द्वारा चोर की 
कर्म हुआ हत्या करना, लेकिन फल में अंतर होगा क्योंकि दोनों की नियत में फर्क था।

ऐसे ही अपने देश की रक्षा में फौजी कितने ही उग्रवादियों को मार दे उसे कोई पाप नही लगेगा क्योंकि वह हत्या तो कर रहा है लेकिन अपने धर्म और सही नियत के हिसाब से।



व्यक्ति को कर्म किस प्रकार करना चाहिए ?
(How Should We Act in Life )

कर्म करना हर व्यक्ति के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है, लेकिन सही कर्म करना ही जीवन को सही दिशा देता है।

  1. निस्वार्थ भाव से कर्म करें: जब हम बिना किसी स्वार्थ के कर्म करते हैं तो उसका प्रभाव सबसे शुद्ध और सकारात्मक होता है।
  2. ईमानदारी और सच्चाई के साथ काम करें: कर्म का फल उसकी नियत से तय होता है। जैसी नियत होगी कर्म करते समय, परिणाम वैसा ही होगा।
  3. परिणाम की चिंता किए बिना सही कर्म करना चाहिए: अगर हर समय हम सिर्फ परिणाम के बारे में सोचते रहेंगे तो अपने काम पर पूरा ध्यान नही दे पाएंगें। कर्म पर ध्यान देना चाहिए, फल अपने आप समय पर मिल जाएगा।
  4. दूसरों को हानि पहुंचाए बिना कर्म करना चाहिए: जो दर्द हम दूसरों को देते हैं वही किसी न किसी रूप में लौट कर आता है।
  5. निरन्तर और धैर्य के साथ कर्म करना चाहिए: कर्म का फल देर से मिल सकता है लेकिन गलत नही हो सकता।
सही कर्म करना ही जीवन की सबसे बड़ी कला है।

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