Sukhi Rahne Ka Asli Mul Mantra Kya Hai

जीवन में सुखी रहने का सबसे आसान उपाय क्या है ?

जीवन में सुखी रहने के लिए इंसान क्या नहीं करता ? मेहनत, मजदूरी, नौकरी, बिजनेस और वे सभी कार्य जो उसके जीवन को खुशहाल बना सकें।

लेकिन क्या सुखी रहने के इतने सारे उपायों को करने के बाद इंसान सुखी है? शायद नहीं। 

तो जीवन को सुखी रखने का असली राज क्या है ? चलिए आज की इस पोस्ट में मैं आपको बताता हूं। आपसे एक निवेदन है कि पोस्ट को पूरा पढ़ें और ध्यान से समझें क्योंकि जल्द बाजी में हासिल किया हुआ आधा अधूरा ज्ञान किसी काम का नही होता है।


Dukh Se Bahar Nikalne Ka Asaan Tarika
सुखी जीवन कैसे जिए ? (Ai image)


दुखों का असली कारण क्या है ?

जिस प्रकार दवाई देने से पहले डॉक्टर को रोग और उसका कारण का पता होना जरुरी है। ठीक उसी प्रकार जीवन में सुखी होने के लिए आपको भी दुख का कारण समझना जरूरी है।

क्या आपको पता है कि आपके सभी दुखों कारण " आपकी कर्ता पन ( Doership ) की भावना है।" 


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कर्ता पन ( Doership) क्या है ?

किसी कार्य को आप करते हो तो उसकी सफलता या विफलता पर आपको जब यह अहसास होता है कि यह कार्य मैंने किया या मेरी वजह से यह हुआ। यही कर्ता पन का भाव कहलाता है।

इसको एक उदाहरण के माध्यम से समझते हैं।

जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया और पांडव की विजय हो गए । इस जीत से पांडवों को अहंकार हो गया था।

तब वे आपस में एक दूसरे से कहने लगे 

धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा: मैंने हमेशा धर्म का साथ दिया, कभी झूठ नहीं बोले, हमेशा मर्यादा में रहे, इसलिए जीत हुई।

अर्जुन भी बोले: हां भइया, मेरे बाणों की बौछार ने कौरवों के सीने छलनी कर डाले, इसलिए जीत हुई।

भीम भी कहां चुप रहने वाले थे , वे बोले: हमारी गदा ने दुर्योधन जैसे कई की वीरों की जंघाएं तोड़ डाली। इसलिए जीत हुई।

ऐसे ही नकुल और सहदेव ने भी अपनी अपनी बात कही।

इन सब की बाते बर्बरीक का अध कटा सिर ( जिनको आज कल लोग खाटू श्याम के नाम से जानते हैं) सुन रहा था। वह बहुत जोर जोर से हसने लगा।


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बर्बरीक कौन थे ?


शार्ट में आपको बता दें बर्बरीक भीम के पौत्र और घाटोचक के पुत्र थे जो बड़े पराक्रमी थे। उन्होंने हमेशा कमजोर और असहाय की सहायता करने की प्रतिज्ञा की थी। जब कौरव युद्ध हार रहे थे तो उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा अनुसार कौरवों का साथ देने की बात श्री कृष्ण से कही। 

श्री कृष्ण ने उसको समझाया कि वह कौरवों का साथ न दे। वे अधर्मी हैं।

लेकिन बर्बरीक नहीं माना, तब श्री कृष्ण भगवान ने उसका सिर अपने सुदर्शन चक्र से अलग कर दिया।

अपनी मृत्यु भगवान के हाथों से होने पर बर्बरीक बहुत प्रसन्न हुआ और बोला, भगवन मेरी यही इच्छा थी कि मैं आपके हाथों मरु और मुझे मोक्ष मिल जाए। इसलिए मैंने आपको उकसाया था।

अब मेरी आखिरी इच्छा है कि आप मेरे इस सिर को तब तक जीवित रहने का आशीर्वाद दें जब तक यह युद्ध समाप्त न हो जाए। क्योंकि मैं धर्म की विजय होते हुए अपनी आंखों से देखना चाहता हूँ।

तब भगवान श्री कृष्ण ने प्रसन्न हो कर उसे आशीर्वाद दिया और उसके सिर को एक बहुत ऊंचे पहाड़ पर रखवा दिया जिसे से वह युद्ध का सारा हाल अपनी आंखों से देख सके।

बर्बरीक क्यों हंसा ?

जब बर्बरीक जोर जोर से हसने लगा तब पाण्डवों ने इस तरह उसके हसने का कारण पूंछा।

तब उसने बताया कि मैं तुम लोगों की मूर्खता पर हस रहा हूं।

पांडव बोले, कैसी मूर्खता?

बर्बरीक ने बताया कि तुम लोग जो अपना अपना गुणगान कर रहे हो कि युद्ध हमारे बल से जीता गया। दूसरा कह रहा कि युद्ध हमारे बल से जीता गया। तुम सब मूर्ख हो, इसलिए ही हमें तुम सब पर हंसी आ रही है क्योंकि मैंने तो कुछ और ही देखा।

पाण्डवों ने पूछा, तो तुम बताओ किसके बल से युद्ध में जीत हुई और तुमने क्या देखा?

बर्बरीक बोले: मैंने देखा, अर्जुन जब तीर चला रहे थे तो हर तीर के साथ श्री कृष्ण भगवान का सुदर्शन चक्र चल रहा था, तीर तो सिर्फ तुम लोगों को देखने के लिए था। असली काम तो सुदर्शन चक्र कर रहा था। जोकि अदृश्य रुप से अपना काम कर रहा था।

मेरे इस अध कटे सिर को इसलिए यह सब दिखाई दे रहा था क्योंकि मैंने भगवान से सब कुछ देखने का आशीर्वाद प्राप्त किया था।

इस कहानी में पाण्डवों की विजय के बाद जो उनके अंदर कर्ता पन के भाव उठे कि युद्ध मेरे बल से जीता गया यही सारे दुखों की जड़ हैं।



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जीवन में सुखी रहने का असली तरीका क्या है ?


इस संसार में कोई कुछ नही करता, सब ईश्वर की मर्जी से होता है। हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक का सारा हिसाब किताब पहले से ही तैयार होता है।

क्या आपने कभी सोचा है कि जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं वह कितनी तेज गति से इस ब्रह्मांड में घूमती है। आपकी जानकारी के लिए बता दें।

पृथ्वी, सूर्य के चारों ओर चक्र लगाने के लिए 107000 किलो मीटर प्रति घंटा की स्पीड से आगे बढ़ती है। यानि लगभग 30 किलो मीटर प्रति सेकेंड।  जितनी देर में आपने यह लाइन पढ़ी है उतनी देर में पृथ्वी सैकड़ों किलो मीटर सूर्य के चारों ओर का सफर तय कर चुकी होगी। लेकिन हमें जरा सा भी अहसास नहीं होता।

अब आप मुझे यह बताए कि बिना किसी आधार के इतनी बड़ी पृथ्वी और इससे बड़े बड़े ग्रह आसमान में कैसे टिके हैं ?

अब शायद आप वैज्ञानिक भाषा में जवाब देंगे कि गुरुत्वाकर्षण के बल से।

यही गुरुत्वाकर्षण बल वह प्राकृतिक ऊर्जा है या ईश्वरीय शक्ति है जो एक दूसरे को पकड़े हुए हैं। जो हर वस्तु को अपनी तरफ खींचती रहती है। अपने कंट्रोल में रखती है।

अब आप कल्पना कीजिए कि इतने बड़े बड़े ग्रह बिना किसी आधार के जब सब अपनी अपनी कक्षा में घूमते रहते हैं , कभी एक दूसरे से टकराते नहीं। इन सबको जो कंट्रोल कर सकता है तो वह हमें कंट्रोल क्यों नहीं कर सकता है। 

सुखी रहने के लिए आपको क्या करना चाहिए ?


आपको अपने मन में कभी भी करता पन का भाव नही आने देना चाहिए। जो हो रहा है ईश्वर की मर्जी से हो रहा है, इस बात में विश्वास करने से, कभी आपके साथ यदि कुछ गलत हो भी जाए तो दुख नही होगा।

आपको अपने कर्तव्य पालन में कोई कठिनाई नहीं होगी। जब आप हर काम को ईश्वर की आज्ञा समझ कर करेंगे तब आपसे कोई पाप भी नहीं होगा क्योंकि आप तो कुछ कर ही नही रहे। मतलब अपने कर्म का क्रेडिट स्वयं नहीं लेना है बल्कि ईश्वर को देना है। ऐसा करने से आपके साथ कुछ गलत होगा भी नहीं ऐसा मेरा विश्वास है।

और जब आपके अंदर कर्ता पन का भाव होता है तो आप यह मान के चलते हैं कि जो कुछ कर रहा हूं वह मैं कर रहा हूं। ऐसे में आप उसके अच्छे परिणाम की आशा जरूर करेंगे लेकिन उस काम में यदि नुकसान हो जाए तो दुख भी आपको ही होगा और यदि फायदा होगा तो खुशी भी होगी। 

इससे आपके जीवन में कभी खुशी, कभी गम वाला माहौल बना रहेगा।

और जब स्वयं के कर्ता पन (Doership) का भाव आपके अंदर नहीं होगा तो न ज्यादा खुशी होगी, न ग़म होगा, आप समदर्शी हो जाएंगे।


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