नकारात्मक लोगों से निपटने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?

क्या किसी की कही हुई बातें आपको घंटों परेशान करती हैं ? जानिये मनोवैज्ञानिक कारण और समाधान।

जीवन में हम सभी कभी न कभी ऐसी परिस्थितियों से गुजरते हैं जब किसी की कही हुई बातें हमें अंदर तक चोट पहुंचती हैं।

किसी का मजाक, आलोचना, ताना या कठोर शब्द कई बार हमारे मन में इतने अंदर तक बैठ जाते हैं कि हम उन्हें घंटों, दिनों या कभी कभी वर्षों तक भुला नहीं पाते हैं।

कुछ लोग तो किसी के एक छोटे से कमेंट को इतना अधिक दिमाग पर ले लेते हैं कि उनका आत्मविश्वास ही कम होने लगता है। उनके अंदर तनाव बढ़ जाता है और वे मानसिक रूप से टूटने लगते हैं।

सवाल यह है कि....
कुछ लोग आखिर बातों को इतना अधिक क्यों सोचते हैं ?
वे दूसरों की बातों से इतना प्रभावित कैसे हो जाते हैं ?
और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस समस्या से बाहर निकलने का तरीका क्या है ?

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आइए इस विषय को अच्छे से समझते हैं।


नकारात्मक लोगों की बातों को कैसे नजर अंदाज करें
नकारात्मक लोगों की बातों से परेशान होती हुई लड़की का चित्र 

दूसरे लोगों की नकारात्मक बातों को दिल पर लेने की आदत कैसे बन जाती है?

दूसरों की नकारात्मक बातों को दिल पर लेने की आदत अक्सर कम आत्म सम्मान, अतिसंवेदनशीलता और लोगों को खुश रखने की चाहत के कारण बनती है।

जब कोई व्यक्ति दूसरों की कही हुई बातों, आलोचनाओं और व्यवहार को आवश्यकता से अधिक महत्व देने लगता है और बार बार उन्हें अपने मन में दोहराता रहता है। इससे यह उसकी आदत में तब्दील हो जाती है।

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कुछ मुख्य कारण जिनकी वजह से यह आदत बनती है।

1. खुद को सही साबित करने की जिद के कारण: जब कोई हमारी आलोचना करता है तो हमारा मन भी प्रतिक्रिया करने का करता है। हम तुरन्त सफाई देने लगते हैं और खुद को सही साबित करने में उलझ जाते हैं।

2. बात को व्यक्तिगत मान लेना: सामने वाले ने जो कुछ कहा वह उसकी सोच या निराशा हो सकती है। लेकिन हम उसकी बात को अपनी व्यक्तिगत कमी मान लेते हैं।

ऐसी सोच रखने वाले लोग अक्सर ऐसा सोचते हैं।

  • उसने मेरे बारे में ऐसा क्यों कहा ?
  • क्या सच में मुझमे यह कमी है ?
  • लोग मेरे बारे में क्या सोचते होंगे ?
  • शायद मैं अच्छा नहीं हूं।
  • मुझे ऐसा नहीं करने चाहिए था।

लोग बातों को इतना अधिक क्यों सोचते हैं ?

1. आत्मविश्वास की कमी: जिस व्यक्ति का आत्मविश्वास कमजोर होता है वह दूसरों की राय पर अधिक निर्भर रहता है। जब कोई उसकी आलोचना करता है तो उसे लगता है कि शायद सामने वाला सही कह रहा है।

आत्मविश्वासी व्यक्ति आलोचना को केवल एक विचार की तरह देखा है। जबकि आत्मविश्वास की कमी वाला व्यक्ति उसे अपनी पहचान बना लेता है।

2. सबको खुश रखने की आदत: कुछ लोगों की आदत होती है कि वे हर व्यक्ति को खुश रखना चाहते हैं। वे चाहते हैं उनसे कोई नाराज ना हो, उनकी कोई बुराई ना करें।

लेकिन वास्तविकता यह है कि दुनिया में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे सभी लोग पसंद करते हो। जब हम सभी को खुश करने की कोशिश करते हैं तो छोटी सी आलोचना भी हमें बहुत कष्ट देती है।

3. अत्यधिक संवेदनशील स्वभाव : कुछ लोग स्वभाव से भावुक और बेहद संवेदनशील होते हैं। वे दूसरों की भावनाओं को गहराई से महसूस करते हैं।

यह गुण बुरा नहीं है लेकिन जब यही संवेदनशीलता जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है तो व्यक्ति हर बात को व्यक्तिगत रूप से लेने लगता है।

4. बचपन के अनुभव : कई बार बचपन में डांट, तुलना और अपमान झेलने वाले लोग, दूसरों की बातों से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। उनके मन में डर पहले से बैठा रहता है कि लोग उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे।

5. ओवरथिंकिंग की आदत : कुछ लोगों को किसी घटना के बाद से ओवरथिंकिंग की आदत बन जाती है इसलिए वे ज्यादा सोचते रहते हैं।

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बातों को दिल पर लेने के नुकसान क्या हैं ?

  1. मानसिक तनाव बढ़ता है : हर समय दूसरों की बातें सोचने से मन बेचैन रहने लगता है। तनाव धीरे धीरे चिंता या अवसाद का भी रूप ले सकता है।
  2. आत्म सम्मान कम होने लगता है : जब हम दूसरों की राय को सच मान लेते हैं तो हमारा आत्म सम्मान कमजोर होने लगता है। हम अपनी अच्छाइयों को भूलकर बुराइयों पर ध्यान देने लगते हैं।
  3. निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है : ऐसे लोग अक्सर सोचते हैं कि लोग क्या कहेंगे ? इस कारण वे अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय भी लेने से डरने लगते हैं।
  4. रिश्तों में दूरियां आने लगती हैं : जब कोई व्यक्ति हर बात का गलत अर्थ लगाने लगता है तो उसके रिश्ते भी प्रभावित होने लगते हैं। रिश्तों में गलत फैमिया बढ़ने लगती हैं।
  5. वर्तमान की खुशियां छीन जाती हैं : जो व्यक्ति हमेशा दूसरों के शब्दों में ही उलझा रहता है वह वर्तमान समय का आनंद नहीं ले पाता है।
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नकारात्मक बातों को दिल पर लेने से कैसे बचें।

1 हर राय या टिप्पणी सत्य नहीं होती : दुनिया में हर व्यक्ति अपनी सोच, अनुभव और नजरिए के हिसाब से बात करता है। यदि कोई व्यक्ति आपके बारे में कुछ कहता है तो यह उसकी राय है अंतिम सत्य नहीं।

2. आलोचना और अपमान में अंतर समझिये : यदि कोई आपकी गलती बताता है ताकि आप बेहतर वन सकें , तो उसे स्वीकार करना चाहिए। लेकिन कोई यदि आपको नीचा दिखाने के लिए कुछ कह रहा है तो उसकी बातों को महत्व देने की आवश्यकता नहीं है।

3. हर बात को व्यक्तिगत मत बनाएं : कोई आपके बारे में कुछ कहता है तो यह उसकी राय है। हो सकता है कि
  • सामने वाला तनाव में हो।
  • उसका दिन खराब गया हो।
  • वह खुद परेशान हो ।
  • उसकी आदत ही कठोर बोलने की हो।
इसलिए हर बात को अपने ऊपर लेना आवश्यक नहीं है।

4. अपने आत्मसम्मान को मजबूत बनाए : जब व्यक्ति खुद को जानता है तो दूसरों की बातें उसे कम प्रभावित करती हैं। जितना आत्म सम्मान बढ़ेगा उतना ही बाहरी शब्दों का प्रभाव कम होगा।

5. ओवररथिंकिंग को रोकने की आदत डालिए :  यदि कोई बात वार वार दिमाग में आ रही है तो स्वयं से पूछिये कि क्या यह बात पांच साल बाद भी महत्वपूर्ण होगी ? ज्यादातर उत्तर होगा नहीं। फिर उस बात को छोड़ना ही बेहतर है।

6. वर्तमान में ध्यान लगाए: जब कभी इस तरह के विचारों में उलझ जाए तो किसी उपयोगी कार्य में मन लगाए जैसे 
  • किताब पढ़ना।
  • व्यायाम करना 
  • संगीत सुनना 
  • मित्रों से बातचीत करना 
  • कुछ नया सीखना 
व्यस्त मन में कम नकारात्मक विचार आते हैं।

7. लोगों को खुश करने की आदत छोड़िये: आप चाहे कितना भी अच्छा काम कीजिए कुछ लोग आलोचना ही करेंगे। यह जीवन का नियम है। जब आप यह स्वीकार कर लेंगे कि जीवन में सभी को खुश करना सम्भव नहीं है तो दूसरों की बातों का हमारे ऊपर कम प्रभाव पड़ता है।

एक छोटी कहानी 

एक बार एक गुरू और शिष्य कही जा रहे थे। रस्ते में कुछ लोग गुरू की खूब आलोचना करने लगे। इस पर शिष्य को बहुत गुस्सा आया।

शिष्य ने कहा, गुरु देव ! ये लोग आपका अपमान कर रहे हैं और आप शांत हो।

गुरू मुस्कराये और बोले , यदि तुम्हें कोई उपहार दे और उस उपहार को तुम लो ही मत, तो वह उपहार किसके पास रहेगा ?

शिष्य ने कहा, देने वाले के पास।

गुरू बोले, ठीक उसी प्रकार यदि कोई तुम्हारा अपमान करे और तुम उसे स्वीकार ही न करो तो वह उसी व्यक्ति के पास रह जाता है।

यह छोटी कहानी जीवन का बहुत बड़ा सत्य सिखाती है।


अन्त में.

दूसरों की बातों को दिल पर लेना एक सामान्य मानवीय प्रवृति है। लेकिन जब यह आदत बन जाती है तो मानसिक शान्ति, आत्मविश्वास और वर्तमान खुशी का गला घोट देती है। हमें यह समझना होगा कि हर व्यक्ति की राय हमारी वास्तविक पहचान नहीं है।

लोग क्या कहते हैं, यह आपके नियंत्रण में नहीं है। लेकिन उनकी बातों को कितना महत्व देना है यह आपके पूर्व नियंत्रण में है।


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